दोस्तों, मैं आपकी इस वेबसाइट का नियमित पाठक हूं। मन हुआ तो अपनी असली घटना आपको भी सुनाने का फैसला किया।
मेरी शादी को बारह वर्ष बीत चुके हैं। विवाह के समय मेरी आयु पच्चीस वर्ष थी जबकि पत्नी सुनीता की उन्नीस वर्ष, किंतु घर में वह सबसे बड़ी थी। मेरी दो सालियां हैं। बड़ी वाली का नाम नेहा है, उसकी ऊंचाई पांच फुट दो इंच, रंग गेहुआं। काया तैंतीस-इक्कीस-अट्ठाईस। यह किस्सा नेहा के साथ मेरी पहली संभोग क्रीड़ा का है।
बारहवीं उत्तीर्ण कर नेहा जब महाविद्यालय पहुंची तो खुले वातावरण से उसके आचार-विचार में काफी परिवर्तन आ गया। वह सलवार सूट ही धारण करती किंतु कुरते की लंबाई व फिटिंग प्रतिदिन संकुचिततर होती जा रही थी। साथ ही मेरे साथ एकांत में शरारत का कोई अवसर हाथ से न छोड़ती। उसे गुदगुदी करना सर्वाधिक प्रिय था। प्रारंभ में मैं चुप रहा किंतु धीरे-धीरे मैंने भी प्रतिक्रिया देना शुरू किया। पैरों तलवों पर, उदर पर, भुजाओं के अंदरूनी भाग पर, ग्रीवा पर, स्तनों के निकट या जहां भी अवसर मिले। ये सब गोपनीय रूप से होता जब आसपास कोई न हो, चाहे मैं ससुराल लखनऊ में रहूं या वह मेरे आवास पर आई हो।
एक बार कार्यवश मैं अपने ससुराल बरेली गया। संध्या समय वह रसोईघर में भोजन बनाव रही थी तो पानी पीने के बहाने मैं भीतर प्रविष्ट हुआ और पीठ से दोनों हाथों से उसके स्तनों को सहजता से थाम लिया। उसने विरोध न किया वरन् शांत भाव से कार्य करती रही। धीरे-धीरे मैंने उन पर चाप बढ़ाया, गालों को चुंबन देने लगा फिर कंठ को और उसके कर्ण को मुख में समेट लिया। वह सिहर उठी और बोली- जीजू क्या कर रहे हो! कोई आ जाएगा।
इन सब से मेरा पुरुषांग तनकर उसके नितंबों की मध्य रेखा में दबने लगा। तभी शांति सासु रसोई में आ गईं और हम अलग होकर वार्तालाप करने लगे।
अगले दिन कार्य हेतु मैं बाहर गया। दोपहर लौटा तो शांति सासु एक कक्ष में तथा नेहा व राजू साला दूसरे कक्ष के दोहरे श्रृंगारयुक्त आसन पर शयनरत थे। मैंने नेहा को जगाया तो वह ह्म्म करके करवट ले सो गई। पुनः हिलाया किंतु न जागी और फिर करवट बदली। इस बार मुख मेरी ओर। नेहा आसन के किनारे थी। बारंबार प्रयास पर भी न जागने से अनुमान हुआ कि निद्रा का अभिनय कर रही। मैंने संकोचपूर्वक ग्रीवा से कुरते में प्रविष्ट कराया किंतु कुरता संकीर्ण होने से गहराई तक न पहुंच सका। केवल ऊपरी भाग से स्पर्श किया और निकाल लिया। फिर आसन पर विराजकर उसके ओष्ठों को मुख में लेकर करीब दस मिनट तक चुक्षित किया। वह जाग चुकी थी किंतु शांत शयन करती आनंदान्वित हो रही। किंतु इससे अधिक न कर सका क्योंकि राजू साला निकट शयनरत था तथा परदिन मैं लौट आया। विदा लेते समय उसने प्रेमपूर्ण आलिंगन देकर कहा- आई लव यू जीजू!
मैं समझ गया कि पूर्व दिन की घटनाओं से वह संभोग हेतु पूर्णतः तत्पर हो चुकी। मैंने भी आई लव यू कहा और प्रस्थित हुआ।
बीए प्रथम वर्ष परीक्षा उपरांत अवकाश में वह मेरे पास आई। मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ। हार्दिक स्वागत किया। वह पूर्ण एक मास हेतु आई। मेरी पत्नी सुनीता तब एक विद्यालय में नियुक्त हो गई। प्रातः आठ बजकर चालीस मिनट पर प्रस्थित हो जाती। पुत्री प्रिया भी उसके साथ। मेरा कार्यालय प्रस्थान नव बजकर पैंतालीस पर। अर्थात् एक घंटा हम दोनों अकेले।
प्रथम दो दिन सामान्य व्यतीत। तृतीय प्रभात छः बजकर पंद्रह पर सुनीता छत पर वस्त्र सुखाने चली। द्वार ध्वनि से मेरी निद्रा भंग। उठा तो देखा नेहा दूसरे कक्ष में निश्शंक निद्रित। निश्शंक सूट धारण, जोरबंदी थोड़ा संक्षिप्त उदर आधा प्रकट। जोरबंदी से स्पष्ट ब्रा अव्यवस्थित। मैं शांतिपूर्वक उसके निकट शयन एवं उदर पर हस्त रखा। धीरे-धीरे जोरबंदी से उर्ध्वप्रदेश की ओर। प्रथम दक्ष वक्ष पर हस्ताधान एवं वक्षाग्र अंगुली से संभाला। न जागने पर दृढ़ता से सं圧ित एवं ओष्ठों पर अधोष्ठाधान कर चुक्षित करने लगा। तब उसकी निद्रा भंग।
उसने संशय से पूछा- जीजू ये क्या? कोई आ जाएगा।
मैंने कहा- दीदी छत पर हैं, प्रिया निद्रित, कोई भय न। दीदी लौटेंगी तो द्वार ध्वनि होगी, हम संभल जाएंगे।
यह सुनकर उसने जोरबंदी उर्ध्व कर दी।
मैंने प्रश्न किया- पूर्व में किसी से चुक्षित कराया?
वह बोली- केवल एक बार! वह हम दो सहेलियां परस्पर।
मैं वक्ष चुक्षमाण, फिर पूछा- संभोग हुआ?
वह बोली- अभी तक नहीं।
मैं अंतर्मन से प्रसन्न कि नवीन योनि प्राप्त होगी।
‘मुझसे कराओगी?’
तब उसने मुख हस्तेन संनादति। मैं इशारा ग्रहीतुं।
सुनीता कालानुसार प्रिया सहित प्रस्थित। मैं पत्रिका ग्रहीतुं आरंभ। वह लुका-छिपी से आकर गुदगुदी आरंभ। मैंने कहा- पत्रिका पढ़ने दो।
किंतु वह बोली- जीजू! इतनी दूर आकर और तुम पत्रिका में लीन?
मैंने पत्रिका त्यक्त कर उसे आकृष्ट कर गोद में शयन कराया। अब हम पूर्णतः एकांत में। वह गिरते ही मैंने गुदगुदी प्रारंभ किंतु मध्य में वक्ष सं圧ित। किंचित कालोपांत मैंने उसे उठाया, आंतरिक आसन पर लिटाया। सहशयन कर ओष्ठ चुंबन। धीरे-धीरे चुक्षन। वह पूर्ण आनंदान्विता।
मैंने निश्शंक सूट उतार दिया। नग्न वक्ष सामने। पागलपन से चुक्षमाण, समस्त देह चुंबन-लीलासंयुक्त। नेहा मदांध। मैंने कुर्ता-बनियन त्यक्त, आंशिक नग्न नेहा को अधोस्थापित कर स्वयं उर्ध्व शयन कर वक्ष चुक्षन पुनः।
वह नेत्र निमीलित आनंदग्रस्त, आह-ऊंह ध्वनयुक्त। उर्ध्व शयनावस्था में पुरुषांग उसकी योनि पर घर्षण प्रारंभ। वह विक्षिप्त, अकस्मात् उठी, मुझे अधोस्थापित कर स्वयं उर्ध्व, मेरे ओष्ठ चुक्षमाण किंतु हस्तेन पाजामाश्रित पुरुषांग संनादति।
मैंने नाड़ा मुक्त, पाजामा-अंडरवियर त्यक्त। तनित पुरुषांग बाह्य सलामी। नेहा हस्तेन संनादति, अधोभाग जिह्वा से प्रलीह। मैं स्वर्ग सुखानुभव। धीरे-धीरे प्रलीहन चुक्षनाति। पुरुषांग मुख प्रविष्ट-निःप्रविष्ट, मैं सातवें स्वर्ग। वह दीर्घकालन लंडीप समान चुक्षमाण, प्रथम ही वीर्योत्सर्ग कर गृहीतुं। देखकर मैं उत्तेजित। पुरुषांग शांत। किंचित शयन।
इतस्तत वह सलवार त्यक्त, केवल अंतर्वस्त्रेण प्रतिष्ठिता। वासना पुनरुत्थिता। मैंने हस्ताकर्षित स्वयं उर्ध्व गिराया, प्रेमपूर्ण चुंबन। धीरे-धीरे अंतर्वस्त्र में हस्त, योनि संनादन। चिकनतम।
पूछा- कब शौचित?
बोली- परसों!
मैंने अधोस्थापित, अंतर्वस्त्र त्यक्त। हम पूर्ण नग्न। उसे पूर्ण नग्न देख मंत्रमुग्ध।
वह बोली- जीजू बस देखोगे या...
तंद्रा भंग, बोला- नेहा काया संक्षिप्त किंतु कामुक अति।
मैंने मस्तकादि पादपर्यंत चुंबन, उर्ध्व उत्तोलित योनि मुख ग्रहण। सिसकारी। जिह्वा प्रलीहन। शीघ्र मुखे जलोत्सर्ग। चुक्षन अविरत। घटी दृष्टौ दश बजे पांच मिनट शेष। लोह तप्त। कार्यालय फोन- विलंब। नेहा प्रसन्न। योनि जिह्वा संभोग।
वह विक्षिप्त- जीजू बस! साली को चोदो! लंड योनि में प्रक्षेपित करो! घरवाली बना दो!
किंतु मैं शीघ्र समापन कर्ता? दिवस मध्याह्न दो बजे कार्यालय। तब तक त्रिसंभोग।
Kahani padhne ke baad apne vichar comments mein zaroor likhein – Amit Sharma