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Hindi Sex Stories – हिंदी सेक्स कहानियाँ

क्या करूँ मैं? - भाग 1


मेरा नाम पायल है, उम्र तेईस साल, एक बच्चे की माँ।

मेरे स्वभाव में दो बातें हैं—एक गुस्सा बहुत आता है, दूसरा मैं बहुत कामुक हूँ। गुस्से में मैं संतुलन खो देती हूँ। इसी वजह से तीन साल पहले मैं मायके आ गई। पति के लाख मनाने पर भी वापस नहीं गई। वजह ये कि वो मुझे ठीक से चोदकर संतुष्ट नहीं कर पाते। उनकी चुदाई मेरी इच्छा पूरी नहीं करती।

मायके आकर मैंने नौकरी शुरू की। वहाँ एक युवक से मुलाकात हुई—सुंदर, चंचल। नाम प्रशांत। छोटी-छोटी मुलाकातों में उसकी ओर खिंचती चली गई।

प्रशांत को पता था मैं शादीशुदा और बच्चे की माँ हूँ। डर था कहीं वो ठुकरा न दे। ऑफिस में बात होती लेकिन दिल की बात होठों पर नहीं आती।

मेरी सहकर्मी जिमी गोवा की रहने वाली है, आधुनिक ख्यालों की। बातों में पता चला उसका तलाक हो चुका है। मैंने अपनी परेशानी बताई। उस दिन से दोस्ती हो गई।

एक दिन प्रशांत मेरे पास फाइल देख रहा था। उसे देखकर मेरी कामना भड़क उठी। मैं खोई हुई थी। फाइल उल्टी पकड़ रखी थी। जांघें भींचकर चूत दबा रही थी। चूत के रस की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।

प्रशांत चला गया। जिमी मेरे चेहरे से सब समझ गई।

मैं बाथरूम गई। साड़ी पेट तक उठाई। पेंटी नहीं पहनती। दरवाजा बंद करना भूल गई। पैर दीवार पर टिकाया। चूत साफ दिख रही थी। पेन चूत पर रखा तो फुदक उठी।

सीई… मत तड़प मेरी रानी… मैं मजबूर हूँ… कल से मोमबत्ती लाकर रख दूँगी!

मैं चूत से बातें कर रही थी। तभी दरवाजा खुला। जिमी खड़ी थी।

वाह पायल… तू इस बेचारी को पागल बना रही है!

ऊँ… फिर क्या करूँ? इसकी किस्मत में अब ऐसी चीजें ही बची हैं!

ऐसी बात नहीं। मैं तेरी चूत की गर्मी निकाल दूँगी।

कैसे?

ऑफिस में लंगूर भरे हैं। बाबूलाल चपरासी भी तैयार है!

नहीं, मेरी चूत का दिल प्रशांत पर है।

हाँ, गलत आदमी चुना। वो सन्यासी टाइप है।

फिर कैसे बनेगी बात?

तेरी चूत पागल हो चुकी है। जब पेन फंसाया था तो सफेद बुलबुले निकल रहे थे। पागल कुतिया की तरह।

सच में?

हाँ। अब बाबूलाल ही इसका इलाज कर सकता है। उसका इंजेक्शन लंबा-मोटा है।

ठीक है, देख लेते हैं।

बाबूलाल कॉफी लेकर आया। जिमी बोली—आज रात चुदाई का खेल जमाना है।

मूड नहीं है मैडम!

क्यों?

तुम्हारी चूत की धज्जियाँ उड़ चुकी हैं। अब मजा नहीं आता।

धज्जियाँ उड़ाने वाला तू ही है। तू मना नहीं कर सकता!

खेल जम जाएगा लेकिन…

क्या लेकिन?

दारू तक के फाके हैं।

जिमी ने 500 दिए। बाबूलाल बोला—ठीक 10 बजे!

मैं घर आ गई। नहाई, चूत को दस बार धोया। घर में कहा जिमी के साथ शादी में जा रही हूँ।

9 बजे जिमी के घर पहुँची। वो ब्रा-पेंटी में थी, दारू पी रखी थी। चूचियाँ टाइट ब्रा से बाहर आने को बेताब।

क्या वो आ गया?

नहीं, बस आने वाला है। टाइम का पक्का है।

अभी सवा नौ। बस दस बजेंगे तो तेरी चूत के बारह बज जाएँगे।

रुक, जब तक बाबूलाल नहीं आता मैं तेरी खुजली मिटाती हूँ।

वो कमरे से लंबा मोटा डंडा लेकर आई। दोनों सिरे लंड जैसे गोल।

अब देख क्या करती हूँ!

इससे मेरी चूत मारेगी?

नहीं यार, तुझे शादी का टिकट किसने दिया? एक बच्चे की माँ होकर भी पागल बातें करती है।

ओह… समझ गई। यह डंडा हमारे काम आएगा।

अब साड़ी उतार फेंक!

वो नंगी हो गई। मैंने भी सब उतार फेंका। कपड़े अब बुरे लग रहे थे।

हम नंगी आमने-सामने। जिमी बोली—वाह… क्या मस्त चूची है तेरी! और जोर से दबाने लगी।

माल तो तेरे पास भी बढ़िया है!

मैंने उसकी चूची दबाई। वो मुझसे लिपट गई।

सीई… बस… और न दबा… मेरा अंग-अंग फड़क उठता है!

हाय… मेरे अंदर की आग मुझे झुलसा रही है जिमी…

पाँच मिनट हम एक-दूसरे के अंग सहलाती-नोचती रहीं। चूचियाँ सटी हुई। चुचूक से चुचूक रगड़ खा रहे थे।

फिर जिमी ने डंडा उठाया। हम आमने-सामने। डंडा बीच में। एक सिरा उसकी चूत पर, दूसरा मेरी पर।

[शेष अगले भाग में]

Kahani padhne ke baad apne vichar comments mein zaroor likhein – Rohit Kumar

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