दोस्तों! सबसे पहले मैं आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद करना चाहता हूं कि मेरी पिछली वाली कहानी 'अब तो चोद ही दूं' का पहला हिस्सा आपको इतना भाया। मैंने उसमें वर्णन किया था कि किस तरह मैंने अपनी ट्यूशन पढ़ने वाली सहपाठी नेहा के साथ संभोग किया। नेहा को चोदने के बाद जब हम उसके घर से बाहर निकले तो ट्यूशन कराने वाली अध्यापिका रीता वर्मा ठीक सामने आ गई। जिस ढंग से वह हमें निहार रही थी, मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि उसे शंका हो चुकी है कि हमने उस स्थिति का पूरा लाभ उठा लिया है।
मैंने नेहा से ठिठोली में कहा था कि इस टीचर को भी पटाकर ठोक दूंगा, लेकिन अंदर से मैं बेहद भयभीत था। सच्चाई तो यह है कि डर के मारे मेरी गांड फटने को थी, क्योंकि अगर अध्यापिका ने वह भीगी चादर देख ली तो मैं पक्का फंस जाऊंगा। अब तो केवल गोपीकृष्ण का ही भरोसा बाकी था। अगले दो दिन मैं ट्यूशन में गया ही नहीं।
तीसरे दिन शाम को जब मैं उसके घर पहुंचा तो अध्यापिका ड्राइंग रूम में विराजमान थीं, मानो हमारा इंतजार ही कर रही हों। सरला आंटी भी उनके पास बैठी हुई थीं। जिस भांति वे दोनों फुसफुसाते हुए मुझे देख रही थीं, लगा जैसे उनकी निगाहें किसी एक्स-रे की तरह मेरी तह तक झांक रही हों। सरला आंटी खड़ी हो गईं और रहस्यपूर्ण हंसी के साथ अपने घर लौट गईं। अब अध्यापिका ने मुझसे सीधे बात की।
"हम्म... तुम कल नहीं आए अजय?"
"वो... वो..." मेरे गले से आवाज ही नहीं निकल पा रही थी।
"हम्म...?"
"वो... असल में मेरी तबीयत ठीक नहीं थी।"
"क्यों, तुम्हें क्या हो गया था?"
"ब... ब... बुखार आ गया था?"
"वायरल तो नहीं था?"
"हां हां, वही था!"
"तो एक ही दिन में ठीक हो गए?"
"वो... वो..." मैं क्या कहता। मैंने सिर झुका लिया।
"उस लड़की को क्या हुआ?"
"कौन...?"
"अरे मैं मर जाऊं? मैं उसी चुलबुली नेहा की बात कर रही हूं?"
"ओह... वो... वो... ओह... मुझे क्या पता?" मैंने सिर झुकाए रखा। मुझे लग रहा था अगर नजरें मिलाईं तो अध्यापिका सब भांप लेंगी।
"तुमने उसके साथ तो कुछ कर डाला था न?"
"न... नहीं... मैंने कुछ नहीं किया!"
मुझे लगा मेरा गला सूख रहा है। मेरे चेहरे पर पसीना छूट रहा था। लग रहा था हमारी नेहा के साथ चुदाई की पोल पट चुकी है।
"तुम इतना क्यों घबरा रहे हो फिर?" अध्यापिका ने दोबारा पूछा।
"न... नहीं तो... मैं क्यों... घबराऊंगा...?" मैंने हिम्मत जुटाकर उत्तर दिया। मैंने देखा अध्यापिका मेरी घबराहट देखकर हल्के-हल्के मुस्कुरा रही हैं।
"एक बात बता मुझे!"
"क्या?"
"यह चादर गीली क्यों हो गई थी?"
"वो... वो...?"
अब शक का कोई स्थान बाकी नहीं था। अध्यापिका को सब मालूम हो चुका था। मैं सिर झुकाए खड़ा रहा।
"कहीं पानी का गिलास तो नहीं गिर गया था?"
मैं चुप रहा। थोड़ी देर बाद अध्यापिका ने फिर कहा, "पानी ठीक से पिया या सिर्फ चादर पर ही गिराया?"
"वो... वो...?"
"केवल तुमने पिया था या उस शरारती ने भी पिया था?"
"हां, उसने भी पिया था।"
"हम्म... उसे भी पानी भाया?"
पता नहीं अध्यापिका क्या-क्या पूछ रही थीं। मुझे लगा शायद मैं बच निकल सकता हूं। मेरी सांस में सांस आ सकती है। अगर एक बार बच गया तो गोपीकृष्ण की कसम, उस शरारती की ओर दोबारा नजर न डालूंगा। मैं अपने विचारों में डूबा था।
अध्यापिका ने फिर कहा, "यह लड़की तो बड़ी चुदक्कड़ निकली न? ... इसके तो पंख निकल आए, अभी से लंड खाने लगी है, आगे चलकर कौन जानता क्या करेगी?"
मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अध्यापिका ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रही हैं। वह अपनी चूत को पायजामे के बाहर से मला और खुजलाई रही थी। आज उन्होंने पतला कुर्ता और पायजामा पहना था। उनकी सांसें तेज चल रही थीं और आंखों में कालापन तैर रहा था।
"उस शरारती को अच्छे से ठोका या नहीं?" वह मेरी ओर देखकर हंसने लगीं, फिर बोलीं, "मैं जानती थी, जिस तरह वह अपनी गांड हिलाती चलती है, जरूर लंड की भूखी बनेगी।"
अब मेरी जान में जान आ गई। इतना तो निश्चित था कि अध्यापिका इसे घरवालों को कम से कम नहीं बताएंगी। मैं चुपचाप उन्हें निहारता रहा।
उन्होंने फिर पूछा, "उसे खून निकला या नहीं?" "वो... वो... हां आया था, चादर पर भी लग गया था, इसलिए... वो... गीली..."
"हम्म... तेरे तो बड़े मजे हो गए अजय... मैं तो तुझे बहुत सीधा समझती थी, तू तो कमाल का निकला?"
"वो दरसल मैं तो आपका ही शिष्य हूं न?" मैंने कह दिया।
"है बावले शिष्य, इस तरह तो नहीं बनते?"
"तो कैसे बनें?"
"पहले गुरुदक्षिणा देनी पड़ती है?"
"आप जो कहें, दे दूंगा?"
"लगता है अब तू बेवकूफ नहीं रहा, बड़ा होशियार हो गया?"
मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। लग रहा था अध्यापिका के दिमाग में भी कुछ खुराफात घूम रही है। हे गोपीकृष्ण, अगर ये पट गईं तो मजा आ जाएगा। फिर तो दोनों हाथों में लड्डू होंगे, पूरी दुकान ही हाथ लग जाएगी।
उन्होंने इशारे से मुझे बुलाया। मैं सोफे पर उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरी जांघ पर हाथ रखा और बोलीं, "चल, सारी बात शुरुआत से बता, कुछ छिपाने की जरूरत नहीं। कैसे उस शरारती के साथ बिस्तर पर लुढ़के? मैंने तो तुम्हें ढाई-तीन घंटे दिए थे मजे लूटने को?" कहते हुए उन्होंने मुझे आंख मारी। मेरा शेर तो उछल पड़ा। पैंट में उसका उभार साफ दिखने लगा। अध्यापिका ने अपनी जांघें आपस में दाब रखी थीं और एक हाथ से अपनी चूत को रगड़ रही थीं।
मैंने सारी घटना सुना दी। इस बीच अध्यापिका ने मेरा लंड पैंट के ऊपर से मसलना शुरू कर दिया। मेरा लंड खूंटे सा खड़ा हो गया। उनकी सांसें तेज हो गईं और मेरा शेर पैंट फाड़ने को आतुर था। अचानक उन्होंने मेरी पैंट की जिप खोली और फर्श पर घुटनों के बल बैठ गईं। मुझे शर्म भी आ रही थी और उत्तेजना भी बढ़ रही थी। उन्होंने पैंट के अंदर हाथ डाला और मेरे कड़े लंड को बाहर खींच लिया। उनकी आंखें फैल गईं। मेरा 7 इंच लंबा मोटा ताजा लंड देखकर वे मदमस्त हो गईं। आप जानते हैं मेरे लंड का सुपड़ा बहुत बड़ा है, मशरूम जैसा। मेरी उत्तेजना चरम पर थी और शेर उनके हाथों में छटपटा रहा था जैसे बिल्ली के पंजों में चूहा।
"वाह अजय, तेरा शेर तो बहुत विशाल और भव्य है?" इतना कहकर उन्होंने उस पर चुंबन कर दिया। शेर ने ठुमका लगाया। उन्होंने उसे मुट्ठी में कस लिया। "वह कबूतर इस मर्दाना लंड को कैसे संभाल गई?"
फिर उन्होंने चुंबन लिया और मुंह में भर लिया। मैं सातवें आसमान पर था। जिस तरह वे चूस-चूम रही थीं, लगा ये भी पक्की चुदक्कड़ हैं। चलो, मेरी तो बल्ले-बल्ले हो गई। मैंने पैंट ढीली की और कूल्हे उठाकर उतार दी। इससे उन्हें आसानी हुई। वे जोर-जोर से चूसने लगीं। कभी अंडकोष मसलतीं, कभी निचोड़तीं, कभी पूरा मुंह में लेतीं, कभी बाहर निकालकर चाटतीं। उनकी गर्म सांसें मेरे पेट पर पड़तीं तो रोमांच होता और शेर ठुमके लगाता। वे बिना थके चूसती रहीं, पता नहीं कितने दिनों की प्यासी थीं।
"आह..." मेरी सिसकारियां निकलने लगीं और शेर झटके खाने लगा। लगा मोम पिघल जाएगा। अध्यापिका जानती थीं। उन्होंने पूरा लंड मुंह में भरा और कूल्हे पकड़े। मेरा तनाव चरम पर था। मैंने उनका सिर पकड़ा। आंखें बंद होने पर तारे नाचने लगे और वीर्य की धार छूट गई। गर्म माल उनका मुंह भर गया। वे गटागट पी गईं। एक बूंद भी नहीं गिरी।
लंड सिकुड़ने लगा। उन्होंने आखिरी चूस ली और जीभ फेरते हुए बोलीं, "वाह अजय, आज तो मजा आ गया। कुंवारे लंड की गाढ़ी ताजी मलाई लाजवाब थी। जियो मेरे सांड..." कहकर मुझे चूम लिया।
मुझे हैरानी हुई कि नेहा मुझे इसी नाम से पुकारती थी, इन्हें कैसे पता?
"मैडम, आप तो संतुष्ट हो गईं, लेकिन मैं तो अधूरा रह गया न?" मैंने शिकायत की।
"अरे बावले, चिंता क्यों कर रहा है... अभी बहुत समय बाकी है? फिक्र न कर!" कहकर वे बाथरूम चली गईं। मैंने पैंट पहनी और इंतजार किया।
दस मिनट बाद वे लौटीं। उफ्फ... बाल खुले, लाल तौलिए से वक्ष ढके, जो चिकनी मोटी जांघों और स्तनों को छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। अगर दो इंच छोटा होता तो चूत दिख जाती। तौलिया कसकर पकड़े, नितंब मटकाती, होंठ काटती मेरे पास खड़ी हो गईं। उनकी अदा से मेरा शेर फिर जागा। मैं दंग देखता रहा। उनका गठा शरीर मूर्ति सा लग रहा था। रोज देखता था, लेकिन इस रूप में पहली बार। उनकी गर्मी महसूस हो रही थी, जैसे भट्टी के सामने खड़ा हूं। सांसें थम गईं, शेर फिर तैयार हो गया।
"ओह... फिर पैंट क्यों पहन ली? अब इसका क्या काम? उतार दे इसे!"
"आपने तो तौलिया लपेटा है?"
"ओह... मेरी बात अलग है, चल नंगा हो जा, पैंट-कमीज उतार दे!"
मैं शरमाते हुए उतार दिया, लेकिन शेर पर हाथ रख लिया। बनियान-कच्छा तो पहना ही नहीं था। उन्होंने कहा, "कभी सहस्त्रधारा का जल पिया है?"
मुझे समझ न आया। गंगाजल तो सुना था, यह पहली बार। कुछ न समझा तो सिर हिलाया।
मुझे लगा फिर मूर्ख कहेंगी, लेकिन वे हंस पड़ीं। मोतियों जैसे दांत, कातिल मुस्कान, होंठ काटना, मुझे अंदर तक भिगो गया। मन किया बाहों में भर लूं, पटककर चूत में ठोक दूं, लेकिन रुका।
"हाय मैं मर जाऊं... मेरे मूर्ख बालम..." कहकर बाहें फैलाईं। तौलिया गिरा, मोटे गोल स्तन खुल गए। चूंचियां मूंगफली जितनी गुलाबी, एरोला दो इंच गहरे लाल। स्तन थोड़े लटके थे, वरना नेहा को भी हरा देतीं।
मैंने उन्हें बाहों में लिया। उनकी सांसें तेज। उन्होंने मेरा सिर पकड़ा और होंठ जोड़े। मैं गुलाबी पंखुड़ियों को चूसने लगा। एक हाथ पीठ पर, एक नितंब सहलाता।
वे बेकाबू होंठ चूस रही थीं। मैंने जीभ मुंह में डाली तो कुल्फी सा चूसा। अनोखा सुख। कभी उनकी जीभ मेरे मुंह में, कभी मेरी उनकी में।
मैं चूमने में खो गया, चूत पर ध्यान न गया। शेर ने सलामी दी। मैंने हाथ चूत पर फेरा। बालों वाली चूत भीग चुकी। अंगुली डालने की कोशिश की तो चिहुंकीं।
"ऊई... मां..."
"क्या हुआ?"
"ओह... ऐसा नहीं, चलो बिस्तर पर!"
"हां..."
फिर बुद्धि पर तरस आया। हम बिस्तर पर। नई चादर बिछी। वे लेटीं, लेकिन चूत पर हाथ रख, जांघें बंद। अटपटा लगा, अब शर्म कैसी। लेकिन महिलाएं लज्जा नहीं छोड़तीं।
चोदना तो था ही। मेरा शेर हिलोर मार रहा। मैं बगल लेटा, स्तनों पर हाथ फेरा। जीभ एक चूंची पर फेरी तो सिसकारी। चूसना शुरू। एक दबाता, दूसरे को चूसता।
वे मग्न हो गईं। आंखें बंद, सिसकारियां। दोनों स्तनों को चूसा। फिर हाथ चूत की ओर। फांकें सूजीं। नीचे सरककर जीभ नाभि तक चाटी।
जीभ चूत छूते ही किलकारी। जांघें खुलीं, पंखुड़ियां फैलीं। अंदर काली, बाहर गोरी, झाड़ी से ढकी। चुंबन लिया। मादक गंध। उनकी मादक सिसकारी।
आंखें बंद, आहें। मैंने फांकें चौड़ी कीं। अंदर गुलाबी, गीलापन धाराओं सा। सहस्त्रधारा समझ आया।
होंठ फांकें पर। नमकीन स्वाद नेहा जैसा, गंध अलग। जीभ नुकीली कर दरार चाटी। दाना चेरी सा लाल। जीभ फेरी, दांत दबाए तो चीखते बची।
"अरे... ओह... अजय... चूस... जोर से... आह... यााा ईईईई..."
मैंने चूत मुंह में भरी, जोर से चूसी। वे कांपने लगीं। पैर उठाती-पटकतीं। सिर पकड़कर चूत दबाई। सिसकारियां।
शरीर अकड़ा, सिर दबाया, सांस रुकी। चूत से गाढ़ा रस छूटा। मैं पीकर तृप्त।
वे नशे में बड़बड़ा रही थीं। अचानक मुझे धकेला, चित किया, पैर फैलाकर लंड पकड़ा, चूत पर घिसा।
सुपड़ा छेद छूते ही झटका लगाया, पूरा लंड अंदर। चीख निकली।
"आईईईईईईईई..."
लंड अंदर, लेकिन जोश में दर्द हुआ। आंखें बंद, बैठी रहीं। सामान्य होकर होंठ चूमा, "अजय... तू पूरा सांड है, जान ले ली!"
"क्यों... मास्टरजी का छोटा है?"
"छोड़... वो तो नाम का ही है। बेकार। मैं उंगली से तृप्त होती हूं, वह शिमला के जंगलों में फॉरेस्ट अधिकारी बना गांड मरवा रहा है, हरामी!"
जोश में ठुमके लगाए। चूतड़ थिरके। मैंने स्तन मसले, वे नीचे होकर मुंह लगाईं। मैं चूसा। सिसकारियां।
"आह... कितने दिनों बाद मस्त लंड... जियो सांड... उम्म्म..." होंठ चूमा।
मैं भी नीचे से धक्के दे रहा। हाथ नितंब सहलाए। वे ऊपर-नीचे। कभी लेटीं।
मन था ऊपर आकर ठोका दूं। अंगुली गांड छूई। मस्तराम वाली कल्पना।
लेकिन वे अपनी चूत घिस रही। झांटों से रगड़ मजा ले। अंगुली गांड में। गीली थी। अंदर चली, चीत्कार, "ओह... ये क्या कर रहे हो?"
"क्या हुआ?"
"ना... इस छेद को अभी न छुओ... बाद में? चिंता मत कर, दोनों में एक साथ डलवाऊंगी।"
तसल्ली। वे जोर से धक्के, चूत सिकोड़। उस्ताद तरीका।
20-25 मिनट। मैं खलास के करीब। वे दबाए हुए। सिसकारियां तेज, चूत भींची। किलकारी, ढेर हो गईं।
मैंने कमर पकड़ी, पलटी, ऊपर आया। धक्के लगाए। वे लेटीं। मेरा ज्वाला फूटा, वीर्य छूटा। उनकी आहें, अकड़न ढीली। बाहें कसीं।
10 मिनट लेटे। लंड फिसला। चूत से मिश्रण चादर भिगोया। इशारा मिला, उठा। लंड गंदा। बाथरूम गया।
साफ कर तेल लगाकर लौटा, वे लेटीं। चूत न धोईं। "एक बार और!"
मेरा शेर निचुड़ चुका, लेकिन मन भरा न। वे चोदी थीं। डॉगी में चोदना था। पास बैठा, वे जांघ पर सिर, लंड चुंबन। अलसाया। डर लगा।
महिलाओं के हाथ जादू। मसलने लगीं, चूसीं। शेर जागा।
"अजय, घोड़ा तैयार?"
"आप घोड़ी बनो, मैं सवार होऊं?"
टेढ़ी नजर। घुटनों पर, गांड ऊपर। पीछे। जांघों में फांकें मोटी। गांड छेद सिकुड़ता।
लंड लगाया, कमर पकड़ धक्का। पूरा अंदर।
चीख, "धीरे... जल्दी क्या?"
धक्के शुरू। चूतड़ हिले, थप्पड़ लगाए। सिसकारियां। थप्पड़ों से मजा।
घुड़सवारी। लंड बच्चेदानी तक। आहें।
"आह... उई... जोर से... सारे गुस्से निकाल... तंग किया इसने... आह..."
शेर खूंखार। गति तेज। पसीना। असली मजा। नेहा वाली में डर था।
वे निढाल, चूत सिकोड़ी। 15-20 मिनट। धक्के तेज।
गांड देख अंगुली डाली, "बस... निकाल... मैं गई... उईई..."
झड़ीं। चूत ढीली। धक्के, मेरा फूटा। नीचे हुईं, पसर गया। लंड अंदर। स्तन पकड़े, टांगें कसीं।
लेटे रहे। लंड बाहर। मिश्रण फैला। उठे। चादर गीली।
"पंजाबी सांड! चादर खराब। बाथरूम में धो!" "क्यों?" "सरला कभी आ जाए, दो घंटे हो गए।"
हंसी।
"कल का क्या?"
"कल देखेंगे।"
वे चादर लेकर गईं, मैं कपड़े पहन भागा। सोचा दोनों छेद वाली बात का मतलब?
गाना गुनगुनाता घर लौटा।
आज ऊपर आसमान नीचे
नहाया, खाया, लेटा कल का इंतजार।
अगले दिन उनके घर पहुंचा तो बातें सुनाई दीं। अंदर नजारा देख पैरों तले जमीन खिसक गई...
कहानी अभी बाकी है दोस्तों! उनके घर ऐसा क्या देखा, अगली किश्त में। लेकिन तब जब आप कमेंट करेंगे। जो देखा, वो 1000 वाट करंट से कम न था।
Kahani padhne ke baad apne vichar comments mein zaroor likhein – रवि शर्मा